रवि शंकर शर्मा

आक्रोश मनुष्य की स्वाभाविक भावनाओं में से एक है। अन्याय, अपमान, असफलता, उपेक्षा या किसी अप्रिय घटना के प्रति मन में क्षोभ पैदा होना अस्वाभाविक नहीं है। समस्या तब शुरू होती है, जब यही आक्रोश विवेक पर हावी हो जाता है और व्यक्ति सही-गलत का अंतर भूलकर ऐसा कदम उठा बैठता है, जिसकी कीमत उसे स्वयं के साथ-साथ परिवार, समाज और कभी-कभी पूरे देश को चुकानी पड़ती है। सवाल यह है कि आखिर आक्रोश की परिणिति बार-बार विध्वंस में ही क्यों होती है ?
गत दिनों थाईलैंड में सामने आई एक घटना ने इस प्रश्न को और गंभीर बना दिया। एक किशोर गेमिंग और उससे जुड़े तनाव से जूझ रहा था। उसका आक्रोश इस सीमा तक पहुंच गया कि उसने अपने परिवार के सदस्यों की जान लेने के बाद स्कूल में भी हिंसा की। यह घटना केवल एक किशोर की मानसिक स्थिति का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह इस बात पर विचार करने के लिए विवश करती है कि आज के बच्चे और युवा तनाव, असफलता, प्रतिस्पर्धा और भावनात्मक दबाव से किस प्रकार जूझ रहे हैं। जब मन में जमा तनाव को समय रहते समझने और व्यक्त करने का अवसर नहीं मिलता, तो कभी-कभी उसका विस्फोट बेहद भयावह रूप ले सकता है।
असम में भी इसी प्रकार की एक घटना सामने आई, जहां एक सुरक्षा बल के जवान ने अपने साथियों की जान लेने के बाद स्वयं भी जीवन समाप्त कर लिया। ऐसी घटनाएं बताती हैं कि अत्यधिक आक्रोश केवल अपराध की ओर ही नहीं ले जाता, बल्कि व्यक्ति को अपने अस्तित्व के प्रति भी निराश और हिंसक बना सकता है। अमेरिका में सार्वजनिक स्थलों और विद्यालयों में गोलीबारी की घटनाएं लंबे समय से चिंता का विषय रही हैं। इन घटनाओं के पीछे अनेक सामाजिक, मानसिक और व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं, लेकिन एक बात समान रूप से दिखाई देती है—बढ़ता तनाव और नियंत्रण से बाहर होता आक्रोश।
यह स्थिति केवल विदेशों तक सीमित नहीं है। हमारे देश में भी छोटी-छोटी घटनाओं के बाद भीड़ के हिंसक होने की प्रवृत्ति चिंता बढ़ा रही है। किसी सड़क दुर्घटना में किसी युवक की मृत्यु हो जाए तो आक्रोशित लोग वाहनों में तोड़फोड़ करने लगते हैं। किसी परीक्षा में अनियमितता का आरोप हो, बेरोजगारी का प्रश्न हो, महंगाई को लेकर असंतोष हो या किसी प्रशासनिक निर्णय के प्रति नाराजगी। आंदोलन लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं, लेकिन जब आंदोलन हिंसा, आगजनी और सार्वजनिक संपत्ति के विनाश में बदल जाता है तो उसका उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है।
हाल ही में पटना में सड़क हादसे के बाद आक्रोशित भीड़ द्वारा कई वाहनों को नुकसान पहुंचाने की घटना भी इसी प्रवृत्ति की ओर संकेत करती है। प्रश्न यह है कि जिन लोगों के वाहनों में आग लगाई गई या जिन सार्वजनिक संपत्तियों को क्षतिग्रस्त किया गया, उनका उस दुर्घटना या समस्या से क्या संबंध था ? जिन पुलिसकर्मियों पर हमला किया गया, क्या वे उस समस्या के लिए जिम्मेदार थे ? और सबसे महत्वपूर्ण बात, क्या इस हिंसा के बाद उस परिवार को न्याय मिल गया, जिसने अपना सदस्य खोया था ?
आक्रोश में की गई तोड़फोड़ से न तो मृत व्यक्ति वापस आता है, न बेरोजगारी समाप्त होती है, न पेपर लीक की समस्या का समाधान होता है और न ही महंगाई कम होती है। उलटे सरकारी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का आर्थिक बोझ अंततः आम नागरिकों पर ही पड़ता है। जिस सड़क, बस, सरकारी भवन या अन्य सार्वजनिक संसाधन को हम गुस्से में नष्ट करते हैं, उसके पुनर्निर्माण में जनता के ही पैसे का इस्तेमाल होता है।
लोकतंत्र ने नागरिकों को अपनी बात रखने का अधिकार दिया है, लेकिन अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है, हिंसा करना नहीं। सरकार से सवाल पूछना नागरिक का अधिकार है, लेकिन पुलिसकर्मी पर हमला करना अधिकार नहीं। किसी व्यवस्था की खामियों के खिलाफ आवाज उठाना उचित है, लेकिन सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करना उस आवाज की नैतिक शक्ति को कमजोर कर देता है।
दरअसल हमें आक्रोश और आंदोलन के बीच का अंतर समझना होगा। आक्रोश तत्काल प्रतिक्रिया है, जबकि आंदोलन किसी समस्या के समाधान के लिए निरंतर और संगठित प्रयास। आक्रोश व्यक्ति को प्रतिक्रिया करने के लिए प्रेरित करता है, लेकिन विवेक उसे यह तय करने में मदद करता है कि प्रतिक्रिया कैसी होनी चाहिए। यही विवेक जब कमजोर पड़ता है तो भीड़ का हिस्सा बना व्यक्ति उन कामों को भी कर बैठता है, जिन्हें वह अकेले शायद कभी न करे।
सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों ने इस समस्या को एक नया आयाम दिया है। किसी घटना की पूरी सच्चाई सामने आने से पहले ही अधूरी सूचना, भ्रामक वीडियो या उत्तेजक संदेश हजारों लोगों तक पहुंच जाते हैं। लोग तथ्यों की पुष्टि किए बिना प्रतिक्रिया देने लगते हैं। कुछ ही समय में व्यक्तिगत नाराजगी सामूहिक आक्रोश में बदल जाती है और फिर भीड़ का विवेक व्यक्तिगत विवेक से भी कमजोर हो जाता है। इसलिए डिजिटल युग में संयम और तथ्यपरकता पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गई है।
युवाओं के संदर्भ में यह प्रश्न और गंभीर है। युवा ऊर्जा का प्रतीक हैं। उनमें परिवर्तन करने की क्षमता है और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस भी। लेकिन यही ऊर्जा यदि सही दिशा न पाए तो विनाशकारी भी हो सकती है। परिवार, विद्यालय और समाज की जिम्मेदारी है कि युवाओं को केवल प्रतियोगिता और सफलता के लिए तैयार न किया जाए, बल्कि उन्हें असफलता स्वीकार करना, असहमति का सम्मान करना, तनाव से निपटना और क्रोध को नियंत्रित करना भी सिखाया जाए।
यहां शिक्षा व्यवस्था की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। विद्यालयों में पढ़ाई और परीक्षा के साथ-साथ भावनात्मक शिक्षा, तनाव प्रबंधन, संवाद कौशल और संघर्ष समाधान जैसे विषयों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
इसी प्रकार सरकार और प्रशासन को भी यह समझना होगा कि हर आंदोलन को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर दबाने की कोशिश समाधान नहीं है। जिन मुद्दों को लेकर युवा सड़कों पर उतरते हैं, उनमें से कई वास्तविक और गंभीर हो सकते हैं। पेपर लीक, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, महंगाई अथवा प्रशासनिक लापरवाही जैसे विषयों पर युवाओं की चिंताओं को सुना जाना चाहिए। संवाद का रास्ता जितना मजबूत होगा, हिंसा की संभावना उतनी ही कम होगी।
लेकिन नागरिकों को भी यह समझना होगा कि किसी समस्या की गंभीरता हिंसा को उचित नहीं बना देती। यदि मांग जायज है तो उसे शांतिपूर्ण तरीके से उठाने पर उसकी नैतिक ताकत बढ़ती है। हिंसा अक्सर मूल मुद्दे को पीछे धकेल देती है और चर्चा इस बात पर होने लगती है कि प्रदर्शनकारियों ने क्या तोड़ा, किस पर हमला किया और कितनी सार्वजनिक संपत्ति नष्ट हुई।
हमें अपने युवाओं से यह कहना होगा कि गुस्सा आपकी शक्ति हो सकता है, लेकिन विवेक उसका दिशा-सूचक है। यदि दिशा खो गई तो वही शक्ति विध्वंस कर सकती है और यदि दिशा सही रही तो वही शक्ति समाज और राष्ट्र के निर्माण में योगदान दे सकती है।
( लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

