व्हीलचेयर पर बैठे हैं, मगर हौसले खड़े हैं,
रास्ते चाहे मुश्किल हों, सपने बहुत बड़े हैं।
पैरों ने साथ छोड़ा तो क्या, दिल ने हार नहीं मानी,
हर ठोकर से सीखी हमने, जीने की नई कहानी।
लोग समझते हैं मजबूरी, हम इसे ताकत कहते हैं,
आँखों में उम्मीद लिए, हर पल आगे बढ़ते हैं।
पहाड़ों की इन राहों में, मंज़िल आसान नहीं,
लेकिन हमारे हौसलों से, कोई ऊँचाई अनजान नहीं।
व्हीलचेयर सिर्फ़ पहिए हैं, पहचान हमारी नहीं,
हमारी मेहनत, हमारी उड़ान—किसी से कम नहीं।
हम चल नहीं सकते तो क्या,
हम रुकेंगे भी नहीं;
जब तक साँसों में हिम्मत है,
अपने सपनों से झुकेंगे भी नहीं।

दिव्यांग सौरभ तिवारी की स्वरचित कविता, अल्मोड़ा, डोबा


