रास्ते मुश्किल हैं तो क्या,
मंज़िल अभी बाकी है,
हमारे हौसलों के आगे,
हर मुश्किल छोटी बाकी है।

पैरों में ताकत कम सही,
इरादों में जान बहुत है,
हम गिरकर फिर उठते हैं,
हममें उड़ान बहुत है।
लोग हमें कमजोर समझें,
तो समझने दो ज़माने को,
हम अपनी मेहनत से लिख देंगे,
एक नया अफसाना जमाने को।
व्हीलचेयर हो या बैसाखी,
ये हमारी पहचान नहीं,
हमारी मेहनत, हमारा साहस,
किसी से कम महान नहीं।
जो दर्द मिला है जीवन में,
उसे अपनी ताकत बनाना है,
आँखों में सपने रखकर,
हर मंज़िल को पाना है।
हम दिव्यांग हैं, मजबूर नहीं,
हम टूटे हैं, मगर चूर नहीं,
जब तक साँसें चलती रहेंगी,
हम हार मानने को मजबूर नहीं।
चलो आज फिर मुस्कुराएँ,
नई उम्मीद जगाएँ,
अपने हौसलों की रोशनी से,
अँधेरों को दूर भगाएँ।
हमारी पहचान हमारी कमी नहीं,
हमारा हौसला है—
और यही हौसला
हमारी सबसे बड़ी ताकत है।
सौरभ तिवारी राजकीय मेडिकल कालेज अल्मोड़ा


