

रवि शंकर शर्मा

एक ओर जहां देश में करोड़ों अपात्र लाभार्थियों द्वारा गरीबों के लिए निर्धारित मुफ्त राशन का लाभ उठाने का मामला सामने आया है, वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि जैसी महत्वपूर्ण योजना में भी फर्जी लाभार्थियों के जरिये सरकारी धन हासिल करने का बड़ा मामला उजागर हुआ है। ये घटनाएं केवल सरकारी योजनाओं में व्याप्त खामियों और प्रशासनिक लापरवाही की कहानी नहीं कहतीं, बल्कि हमारे सामाजिक संस्कारों और नैतिक चेतना पर भी गंभीर सवाल खड़े करती हैं। आखिर जिस अन्न पर किसी गरीब परिवार का अधिकार है, उसे कोई संपन्न व्यक्ति किस नैतिक अधिकार से अपने घर ले जा सकता है ? जिस आर्थिक सहायता का उद्देश्य छोटे और जरूरतमंद किसान को सहारा देना है, उसे फर्जी दस्तावेजों के आधार पर हासिल करने वाला व्यक्ति स्वयं को समाज के सामने किस रूप में प्रस्तुत करता है ?
सबसे चिंताजनक बात यह है कि सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए अपात्र लोगों की संख्या लाखों में नहीं, बल्कि करोड़ों में सामने आ रही है। देश की सबसे बड़ी जनकल्याणकारी व्यवस्थाओं में शामिल राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना के अंतर्गत डाटा इंटीग्रेशन और व्यापक जांच के बाद लगभग 2.44 करोड़ ऐसे लाभार्थियों की पहचान किए जाने की बात सामने आई है, जो योजना की पात्रता पूरी नहीं करते। इनमें संपन्न वर्ग के लोग, कर दाता, कारोबारी और ऐसे लोग भी शामिल बताए जा रहे हैं, जिन्हें किसी भी दृष्टि से मुफ्त राशन जैसी सुविधा की आवश्यकता नहीं है। सरकार अब ऐसे अपात्र लाभार्थियों को योजना से बाहर करने की प्रक्रिया में है।
यह आंकड़ा अपने आप में चौंकाने वाला है। यदि सरकार एक व्यक्ति को प्रतिमाह औसतन 200 रुपये के आसपास का खाद्यान्न उपलब्ध करा रही है, तो एक अपात्र लाभार्थी को योजना से हटाने से सालाना लगभग 2400 रुपये की खाद्य सब्सिडी बचती है। इस लिहाज से 2.44 करोड़ अपात्र लाभार्थियों के हटने पर सरकारी खजाने पर पड़ने वाला बोझ सालाना हजारों करोड़ रुपये कम हो सकता है। इससे पहले भी बड़ी संख्या में फर्जी और अपात्र लाभार्थियों को योजनाओं से बाहर किए जाने के बाद सरकार को हजारों करोड़ रुपये की संभावित बचत हुई है।
लेकिन इस पूरे मामले को केवल सरकारी धन की बचत के नजरिये से देखना पर्याप्त नहीं होगा। असली प्रश्न यह है कि जिस गरीब के नाम पर सरकार ने राशन की व्यवस्था की, क्या वह गरीब वास्तव में अपना पूरा हक पा रहा है ? यदि कोई संपन्न व्यक्ति वर्षों तक गरीबों के लिए निर्धारित अनाज उठाता रहा, तो उसने केवल सरकार को आर्थिक नुकसान नहीं पहुंचाया, बल्कि उस व्यक्ति के हिस्से का अन्न भी लिया, जो शायद दो वक्त के भोजन के लिए संघर्ष कर रहा है।
दूसरी ओर प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना में फर्जी तरीके से लाभ लेने का मामला सामने आना भी कम गंभीर नहीं है। उपलब्ध जांच संबंधी आंकड़ों के अनुसार, लगभग 4.45 लाख कथित फर्जी लाभार्थियों के खिलाफ कार्रवाई और रिपोर्ट दर्ज किए जाने की बात सामने आई है। जांच में बड़ी संख्या में संदिग्ध अभिलेख और आईपी एड्रेस भी सामने आए। बताया गया है कि योजना के शुरुआती वर्षों में फर्जी दस्तावेजों और प्रत्यक्ष प्रविष्टियों के माध्यम से लोगों का पंजीकरण कराया गया तथा जांच पूरी होने तक बड़ी धनराशि उनके खातों में पहुंच चुकी थी। यहां भी प्रश्न केवल इस बात का नहीं है कि सरकारी धन का कितना हिस्सा गलत हाथों में गया। प्रश्न यह है कि जिस योजना का उद्देश्य देश के छोटे और सीमांत किसानों को आर्थिक सहारा देना था, उसमें फर्जी लाभार्थी कैसे प्रवेश कर गए ? यदि लाखों लोग गलत दस्तावेजों के आधार पर योजना में पंजीकृत हो गए और उन्हें कई किस्तों में भुगतान भी होता रहा, तो संबंधित विभागों की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सरकारें जब कल्याणकारी योजनाएं बनाती हैं तो उनके पीछे एक व्यापक सामाजिक उद्देश्य होता है। राशन योजना का उद्देश्य भूख से लड़ना है, जबकि किसान सम्मान निधि का उद्देश्य खेती पर निर्भर परिवारों को आर्थिक सहारा देना है। ऐसी योजनाओं में सेंध लगाने वाला व्यक्ति दरअसल किसी सरकारी तिजोरी को ही नहीं लूटता, बल्कि उस सामाजिक उद्देश्य को कमजोर करता है, जिसके लिए सार्वजनिक धन खर्च किया जा रहा है। दुर्भाग्य से हमारे समाज में सरकारी सुविधा को ‘मुफ्त का माल’ समझ लेने की प्रवृत्ति भी कहीं न कहीं इस समस्या को बढ़ाती है।
सबसे बड़ा सवाल अब वसूली का है। जिन लोगों ने गलत तरीके से सरकारी योजनाओं का लाभ लिया है, क्या उनसे वह धन या उसके समकक्ष राशि वापस ली जाएगी ? यदि कोई व्यक्ति पात्र नहीं था और उसने जान बूझकर गलत जानकारी देकर वर्षों तक सरकारी सहायता हासिल की, तो केवल उसका नाम योजना से काट देना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। जहां कानून और नियम इसकी अनुमति देते हों, वहां अनुचित रूप से प्राप्त लाभ की वसूली के साथ जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए। इससे भविष्य में दूसरों के लिए भी स्पष्ट संदेश जाएगा कि सरकारी योजनाओं के साथ धोखाधड़ी कोई सामान्य बात नहीं है।
लेकिन जिम्मेदारी केवल लाभार्थियों की तय करके सरकार अपनी जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकती। यह भी पूछा जाना चाहिए कि इतने बड़े पैमाने पर अपात्र लोग वर्षों तक व्यवस्था में बने कैसे रहे ? राशन कार्डों और अन्य सरकारी अभिलेखों का नियमित सत्यापन क्यों नहीं हुआ ? कर दाताओं, सरकारी कर्मचारियों, व्यवसायियों और अन्य अपात्र श्रेणियों से जुड़े डाटा का समय रहते मिलान क्यों नहीं किया गया ? किसान सम्मान निधि में फर्जी पंजीकरण होने के बाद कई किस्तों तक भुगतान क्यों चलता रहा ?
आज तकनीक ने सरकार को वह क्षमता दे दी है, जिसके माध्यम से अलग-अलग विभागों के डाटा का मिलान करके बड़े पैमाने पर अनियमितताओं की पहचान की जा सकती है। आधार, बैंक खाते, आयकर संबंधी सूचनाएं, भूमि अभिलेख और अन्य सरकारी डाटा आपस में जोड़कर पात्रता का अधिक प्रभावी सत्यापन किया जा सकता है। जब तकनीक से अपात्र लाभार्थियों की पहचान संभव है तो भविष्य में ऐसे लोगों को योजना में प्रवेश करने से रोकने की व्यवस्था भी मजबूत की जानी चाहिए।
साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि अपात्रों को हटाने की प्रक्रिया में वास्तविक गरीब और जरूरतमंद व्यक्ति किसी तकनीकी गलती का शिकार न हो जाए। डिजिटल सत्यापन और डाटा मिलान जरूरी है, लेकिन उसके साथ मानवीय संवेदना और अपील की व्यवस्था भी उतनी ही आवश्यक है। कई बार दस्तावेजों की त्रुटि, नाम में अंतर या डाटा अपडेट न होने के कारण वास्तविक लाभार्थी भी सरकारी सुविधा से वंचित हो सकते हैं। इसलिए व्यवस्था ऐसी हो जिसमें फर्जी लाभार्थी बाहर हों और वास्तविक जरूरतमंद भीतर सुरक्षित रहें।
दरअसल यह मामला केवल राशन और किसान सम्मान निधि तक सीमित नहीं है। यह हमारे सामने एक बड़े सामाजिक प्रश्न को खड़ा करता है—क्या हम सार्वजनिक संसाधनों को वास्तव में सार्वजनिक संपत्ति मानते हैं ? सरकारी योजना में मिलने वाला लाभ किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है। वह समाज के उस वर्ग के लिए है, जिसके लिए योजना बनाई गई है। इसलिए उसका अनुचित लाभ लेना नैतिक रूप से भी उतना ही गंभीर अपराध है, जितना आर्थिक दृष्टि से।
हमें यह समझना होगा कि किसी गरीब के हिस्से का पांच किलो अनाज भी उसके लिए उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है, जितना किसी संपन्न व्यक्ति के लिए बड़ी रकम। किसी छोटे किसान को मिलने वाली कुछ हजार रुपये की सहायता उसके परिवार की जरूरत पूरी कर सकती है। ऐसे में फर्जी तरीके से उस लाभ को हासिल करना केवल आंकड़ों में दर्ज एक अनियमितता नहीं, बल्कि किसी जरूरतमंद के अधिकार का हनन है।
सरकार को अब तीन स्तरों पर काम करना होगा—फर्जी लाभार्थियों की पहचान, अनुचित लाभ की वसूली और व्यवस्था में जिम्मेदारी तय करना। केवल लाभार्थियों को हटाने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। उन रास्तों को भी बंद करना होगा जिनके माध्यम से अपात्र लोग सरकारी योजनाओं में प्रवेश कर जाते हैं।
अंततः सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी समाज की है। कानून और तकनीक हर व्यक्ति के भीतर ईमानदारी पैदा नहीं कर सकते। यह काम संस्कार और नैतिक चेतना ही कर सकती है। हमें अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि किसी और के अधिकार को छीनकर प्राप्त की गई सुविधा कभी उपलब्धि नहीं हो सकती। इसलिए जरूरत केवल योजनाओं की सफाई की नहीं, बल्कि व्यवस्था के साथ-साथ समाज की नीयत और नैतिकता की भी सफाई की है।
( लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं )

