
वन अधिकार कानून के तहत राजस्व गांव की माँग को लेकर बिंदुखत्ता का आर-पार का ऐलान

बसंत पांडे,
हल्द्वानी/लालकुआं।
बिंदुखत्ता क्षेत्र के लाखों लोग वन अधिकार अधिनियम-2006 के तहत अपनी भूमि को राजस्व गांव घोषित किए जाने की मांग को लेकर स्वतंत्रता दिवस से सड़कों पर हैं। 1909 के अभिलेखों से लेकर 1975 की विजय बहादुर समिति, 1992, 1994, 2002, 2004 के प्रस्ताव, 2015 की नगर पालिका अधिसूचना, 2020 का निर्वनीकरण प्रस्ताव, 2023-24 में वन अधिकार अधिनियम के तहत हुई सभी समितियों की संस्तुतियों के बाद भी फाइलें आगे नहीं बढ़ पा रही हैं। वन अधिकार संगठन, वन अधिकार समिति व पूर्व सैनिक संगठन के नेतृत्व में आंदोलन जारी है और 27 सितंबर को विशाल रैली का ऐलान किया गया है।
वन विभाग के अभिलेखों के अनुसार, चंद्र वंश से पूर्व पर्वतीय क्षेत्र (गढ़वाल-कुमाऊं) के पशुपालक सर्दी और बरसात में अपने पशुओं के साथ बिंदुखत्ता सहित तराई-भाबर के अन्य खातों में आते थे और गर्मी में अपने मूल निवास लौट जाते थे। इन घुमंतू पशुपालकों को ‘घमत्पवा’ कहा जाता था और इनके अस्थाई डेरे को ‘गोठ-खत्ता’ नाम दिया गया। 1909 के राजस्व अभिलेखों में इन खत्तों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। यह भी स्पष्ट करना उचित होगा कि अंग्रेजों ने 1931 में पर्वतीय क्षेत्र के स्थानीय लोगों की मांग पर वन पंचायत जैसी व्यवस्था लागू की, जिससे यह भी स्पष्ट होता है कि ये पशुपालक अपने मूल निवास में भी वनों पर ही आश्रित थे। 1932 से पूर्व इन पशुपालकों से चराई शुल्क लिया जाता था, बाद में उसे माफ कर दिया गया, जिसके अभिलेख उपलब्ध हैं।
देश आजाद होने के बाद 1952 में बिंदुखत्ता क्षेत्र में प्राथमिक विद्यालय की स्थापना हो गई थी, लेकिन 1950-60 के बीच तत्कालीन सरकारों ने वनों को आरक्षित किए जाने के चलते इन घुमंतू पशुपालकों के आवागमन के रास्ते बंद हो गए। इस कारण पर्वतीय क्षेत्र के इन लोगों को सैकड़ों वर्षों से चली यायावरी प्रथा पर विराम लगना शुरू हुआ और आजीविका चलाने को विवश इन लोगों ने तराई-भाबर के जंगलों में स्थाई रूप से रहना शुरू कर दिया। 1965 में वन विभाग ने खामियां ब्लॉक, गौला ब्लॉक एवं लालकुआं ब्लॉक को आरक्षित वन क्षेत्र घोषित कर दिया, जिसके चलते यहां रह रहे पशुपालकों के लिए चराई आदि में कठिनाई होने लगी और वन विभाग से संघर्ष होने लगा। वन विभाग की रिपोर्ट में 1968 में यहां लगभग 3400 हेक्टर भूमि पर अतिक्रमण हो चुका था।
लगातार वन विभाग से हो रहे संघर्षों को लेकर तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने 1975 में विजय बहादुर सिंह वन संरक्षक की कमेटी का गठन कर उक्त संघर्ष को खत्म करने का समाधान खोजने के लिए रिपोर्ट तैयार करने को कहा। समिति ने खत्तों का केंद्रीकरण कर स्थाई रूप से रहने वाले खत्तावासियों को प्रति परिवार 1-1 एकड़ जमीन और सार्वजनिक कार्यों के लिए 5 एकड़ भूमि देने की सिफारिश की, जिसके बाद तत्कालीन वन मंत्री की उपस्थिति में शासनादेश जारी हुआ। इस फैसले से तराई-भाबर के अन्य खातों और पर्वतीय क्षेत्रों के लोग भूमि पाने की लालसा में बिंदुखत्ता आने लगे और जनसंख्या में अचानक वृद्धि हो गई। धीरे-धीरे यहां के लोग पशुपालन के साथ-साथ कृषि करने भी लगे और आज यहां 80,000 से अधिक लोग निवास कर रहे हैं।
सन 1992 में बिंदुखत्ता क्षेत्र में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राजस्व मंत्री की अध्यक्षता में बैठक कर निर्णय लिया गया कि उक्त क्षेत्र का वन बंदोबस्त करवाया जाए। 1994 में तत्कालीन जिलाधिकारी नैनीताल आराधना जौहरी ने सर्वे कर प्रस्ताव बनाकर बिंदुखत्ता क्षेत्र की भूमि को राजस्व भूमि में स्थानांतरित करने का प्रस्ताव भेजा। 2002 में तत्कालीन जिलाधिकारी उत्पल कुमार सिंह ने भू-राजस्व अधिनियम की धारा 48 के अंतर्गत राजस्व ग्राम घोषित किए जाने हेतु प्रस्ताव भेजा। 2004 में तत्कालीन मुख्य सचिव आरएस टोलिया ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को नैनीताल, उधम सिंह नगर व चंपावत वन क्षेत्र के खत्तों को राजस्व गांव में घोषित करने का प्रस्ताव भेजा। उन्होंने अपने पत्र में लिखा कि 1980 अधिनियम लागू होने से पूर्व 1975 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा विजय बहादुर कमेटी की रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि उक्त खाते 1980 अधिनियम लागू होने से पूर्व बसे हैं।
25 फरवरी 2015 को तत्कालीन कैबिनेट मंत्री हरिश्चंद्र दुर्गपाल के कार्यकाल में बिंदुखत्ता को नगर पालिका परिषद में अधिसूचित किया गया और विकास निधि से विकास कार्य भी कराए गए, लेकिन 8 दिसंबर 2016 को इसे निरस्त कर दिया गया तथा राजस्व गांव बनाने के लिए मुख्यमंत्री घोषणा संख्या 242/2011 विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर केंद्र भेजे जाने का प्रस्ताव प्रेषित किया गया। 2020 में तत्कालीन प्रभागीय वन अधिकारी नीतीश मणि त्रिपाठी ने बिंदुखत्ता के निर्वनीकरण का प्रस्ताव शासन को प्रेषित किया।
वर्तमान समय में बिंदुखत्तावासी वन अधिकार अधिनियम-2006 के तहत राजस्व गांव बनाने की मांग कर रहे हैं। इसी कानून के तहत वर्तमान विधायक मोहन सिंह बिष्ट के तत्वाधान में 8 जुलाई 2023 को सामुदायिक वन अधिकार का दावा खंड स्तरीय समिति को दिया गया। 13 अक्टूबर 2023 को उपखंड स्तरीय समिति ने पत्रावली का अवलोकन किया, जिसमें कमी पाई गई, जिसके बाद वन अधिकार समिति ने कमी पूरी की। इसके बाद उपखंड स्तरीय समिति ने 29 दिसंबर 2023 को पुनः बैठक कर अपनी संस्तुति सहित जिला स्तरीय समिति को पत्रावली भेजी। जिला स्तरीय समिति ने 17 अगस्त 2024 को बैठक कर अपनी संस्तुति दी, जिसे 20 सितंबर 2024 को तत्कालीन जिलाधिकारी वंदना सिंह ने अधिसूचना जारी करने के लिए सचिव राजस्व परिषद को भेजा। गौरतलब है कि वन अधिकार अधिनियम-2006 की धारा 3-1(ज) के अनुसार जिला का विनिश्चय अंतिम और आबद्धकर होता है।
वन अधिकार कानून के तहत सभी औपचारिकताएं पूरी होने के बावजूद पत्रावली को आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह राजनीतिक षड्यंत्र है, जबकि बिंदुखत्तावासी वन अधिकार अधिनियम-2006 के अनुसार पूर्ण रूप से पात्र हैं।
वन अधिकार समिति के अध्यक्ष अर्जुन नाथ गोस्वामी पिछले तीन माह से केवल फलाहार पर हैं। उन्होंने ऐलान किया है कि स्वतंत्रता दिवस से चल रहे आंदोलन में वह 27 सितंबर तक अपने घर में प्रवेश नहीं करेंगे। 27 सितंबर को विशाल रैली के बाद ही वह घर वापस लौटेंगे। उनका कहना है कि जब तक बिंदुखत्तावासियों को वन अधिकार अधिनियम-2006 के तहत राजस्व गांव का अधिकार नहीं मिलता, आंदोलन जारी रहेगा।
वन अधिकार संगठन व पूर्व सैनिक संगठन पूरे बिंदुखत्ता के 32 गांव के लोगों को वन अधिकार कानून के प्रति जागरूक करने के लिए पद यात्रा, भजन-कीर्तन और नुक्कड़ नाटकों का आयोजन कर रहा है। यह आंदोलन भारी बरसात से भी प्रभावित नहीं हुआ है। क्षेत्र के सामाजिक संगठनों से लेकर सभी राजनीतिक संगठन और राज्य आंदोलनकारी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं।
वर्तमान विधायक डॉ मोहन सिंह बिष्ट ने वन अधिकार कानून के तहत राजस्व गांव बनाने का संकल्प लिया था, लेकिन अब वह निर्वनीकरण की बात करने लगे हैं, जिससे लोगों में नाराजगी है। स्थानीय लोगों ने क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों से लेकर मुख्यमंत्री तक से मुलाकात कर वन अधिकार अधिनियम-2006 के तहत अधिसूचना जारी करने की जोरदार मांग की है।
27 सितंबर को होने वाली विशाल जनसभा और रैली से सरकार पर कितना दबाव बनेगा और क्या सरकार वन अधिकार अधिनियम-2006 के तहत बिंदुखत्तावासियों को राजस्व गांव का अधिकार देगी, यह समय के गर्भ में है। देखना यह होगा कि सरकार कानून का पालन करती है या फिर से लोगों को निराश करती है। बिंदुखत्ता की यह लड़ाई सिर्फ जमीन की नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और अधिकारों की लड़ाई है, जिसमें पर्वतीय क्षेत्र के मूल निवासियों की संतानें वन अधिकार अधिनियम-2006 के तहत अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं। 27 सितंबर का दिन तय करेगा कि इस संघर्ष को न्याय मिलता है या यह लंबी लड़ाई बनी रहती है।


