
-चार साल बाद रावण परिवार में शामिल हुआ अहिरावण, सांस्कृतिक नगरी की अनूठी परंपरा ने फिर बिखेरे रंग
अल्मोड़ा। सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में दशहरा महोत्सव पारंपरिक उत्साह और उल्लास के साथ मनाया गया। ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच नगर के विभिन्न मोहल्लों में तैयार किए गए रावण परिवार के कलात्मक पुतलों का भव्य जुलूस निकाला गया। इस वर्ष रावण परिवार में पिछले साल के 18 पुतलों के मुकाबले 23 पुतले शामिल किए गए। खास बात यह रही कि चार साल के अंतराल के बाद अहिरावण को भी रावण परिवार में जगह मिली। नगर निगम पार्किंग में एकत्र किए गए पुतलों को बाजार क्षेत्र में घुमाने के बाद एसएसजे परिसर के जूलॉजी मैदान में आतिशबाजी के बीच उनका दहन किया गया। पुतलों को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग उमड़े।
1860 से चली आ रही है दशहरा मनाने की परंपरा
अल्मोड़ा का दशहरा महोत्सव अपनी अनूठी परंपरा, कलात्मक पुतलों और भव्य आयोजन के लिए देश-विदेश में पहचान रखता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, यहां दशहरा मनाने की परंपरा वर्ष 1860 से चली आ रही है। शुरुआती दौर में केवल रावण के पुतले का दहन किया जाता था। वर्ष 1976 में मेघनाद के पुतले को भी इस परंपरा में शामिल किया गया। इसके बाद धीरे-धीरे रावण परिवार के अन्य पात्रों के पुतले भी तैयार किए जाने लगे और आज यह आयोजन अल्मोड़ा की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।
23 पुतलों ने बढ़ाई महोत्सव की भव्यता
इस वर्ष दशहरा महोत्सव में रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद, अतिकाय, अक्षय कुमार, अहिरावण, खर, दूषण, मारीच, ताड़का, नरांतक, मकरासुर, कालकेतु, कालकासुर, विक्रासुर, कराल, धूमकेतु और नरकासुर सहित कुल 23 पुतले शामिल किए गए। कार्यक्रम के तहत सबसे पहले ताड़का के पुतले का दहन किया गया, जबकि अंत में रावण के पुतले का दहन हुआ। आकर्षक वेशभूषा, कलात्मक निर्माण और पुतलों की विविधता ने आयोजन को खास बनाया।
हिंदू-मुस्लिम युवा मिलकर तैयार करते हैं पुतले
अल्मोड़ा के दशहरे की सबसे खास विशेषताओं में पुतलों के निर्माण में सामुदायिक सहभागिता भी शामिल है। यहां करीब एक महीने पहले से ही विभिन्न मोहल्लों के युवा पुतले तैयार करने में जुट जाते हैं। इस काम में हिंदू और मुस्लिम युवा मिलकर सहयोग करते हैं, जो आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक एकता की मिसाल पेश करता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, पुराने समय में बिजली की व्यवस्था नहीं होने पर बद्रेश्वर में मशालों की रोशनी में रामलीला की शुरुआत हुई थी। समय के साथ रावण के पुतले से शुरू हुई यह परंपरा विस्तृत होती गई और आज दशहरा महोत्सव पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
स्थान की कमी से नहीं हुए सांस्कृतिक कार्यक्रम
इस बार स्थान की कमी के चलते दशहरा महोत्सव में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित नहीं हो सके। हालांकि, पुतलों के निर्माण, जुलूस और दहन को लेकर लोगों में खासा उत्साह देखने को मिला। दशहरा समिति की ओर से तैयार किए गए पुतलों का प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कार के लिए चयन भी किया गया।
जनप्रतिनिधियों और दर्शकों की रही मौजूदगी
महोत्सव में केंद्रीय मंत्री एवं सांसद अजय टम्टा, मुख्य अतिथि रंगकर्मी किरन दफौटी, समिति अध्यक्ष अजीत कार्की, सचिव वैभव पांडे, संयोजक धर्मेंद्र बिष्ट, विधायक मनोज तिवारी, दर्जामंत्री गंगा बिष्ट, गोविंद सिंह पिलखवाल, मेयर अजय वर्मा, भाजपा जिलाध्यक्ष महेश नयाल, पूर्व विधायक रघुनाथ सिंह चौहान, कैलाश शर्मा, पूर्व पालिकाध्यक्ष प्रकाश चंद्र जोशी, शोभा जोशी, एसडीएम संजय कुमार, ललित लटवाल सहित अन्य जनप्रतिनिधि मौजूद रहे। आयोजन को देखने के लिए नगर और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचे।
मैसूर और कुल्लू के बाद अल्मोड़ा के दशहरे की विशिष्ट पहचान
सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा का दशहरा महोत्सव अपनी दशकों पुरानी परंपरा और कलात्मक पुतलों के लिए विशेष पहचान रखता है। स्थानीय स्तर पर इसे मैसूर और कुल्लू के दशहरा आयोजनों के बाद देश के प्रमुख दशहरा महोत्सवों में गिना जाता है। यहां विभिन्न मोहल्लों में तैयार किए जाने वाले रावण परिवार के विशाल और आकर्षक पुतले इस आयोजन का मुख्य आकर्षण होते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा अल्मोड़ा की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के साथ ही सामुदायिक एकता और आपसी सहयोग का संदेश भी देती है।


