
नदी प्रदूषण और वायु गुणवत्ता पर बढ़ती चिंता, पर्यावरणीय चेतना समय की मांग
प्रकृति के प्रति श्रद्धा, विज्ञान के प्रति सजगता और जीवनशैली में परिवर्तन ही पर्यावरण संरक्षण का मार्ग
स्वामी चिदानन्द सरस्वती
ऋषिकेश, 24 अक्टूबर 2026। बढ़ता वायु प्रदूषण और नदियों की बिगड़ती जल गुणवत्ता आज केवल पर्यावरण की चुनौती नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य, जीवन की गुणवत्ता और भावी पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। एक ओर साँसों में घुलते सूक्ष्म प्रदूषक चिंता बढ़ा रहे हैं, तो दूसरी ओर जीवनदायिनी नदियों में प्रदूषित जल का प्रवाह नदी के पारिस्थितिक स्वास्थ्य पर प्रश्न खड़े कर रहा है। यह समय प्रकृति के प्रति अपनी प्राचीन श्रद्धा को आधुनिक विज्ञान, प्रभावी व्यवस्था और जनभागीदारी के साथ जोड़ने का है।
परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने संदेश दिया कि “प्रकृति हमारी संपत्ति नहीं, हमारी धरोहर है; नदियाँ हमारी सुविधा का साधन नहीं, जीवन की आधारशिला हैं और स्वच्छ वायु कोई विलासिता नहीं, प्रत्येक हमारा का अधिकार है।”
पूज्य स्वामीजी ने कहा कि, सनातन संस्कृति में प्रकृति को पूजने का अर्थ उनकी रक्षा करना है। नदियों को माँ कहना तभी सार्थक है, जब हम उनके जल को प्रदूषित होने से बचाएँ। वायु को प्राण मानना तभी सार्थक है, जब हम उसे विषाक्त करने वाली गतिविधियों को रोकने के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर जिम्मेदारी निभाएँ। पूजा और पर्यावरण संरक्षण अलग-अलग नहीं, एक ही जीवन-दृष्टि के दो आयाम हैं। याद रखिये गंदगी और बंदगी और पूजा व प्रदूषण साथ साथ नहीं जा सकते।
नदियों में अपर्याप्त रूप से शोधित सीवेज, नालों से आने वाला प्रदूषित जल, ठोस कचरा और औद्योगिक अपशिष्ट नदी की समस्या को बढ़ाने वाले महत्त्वपूर्ण कारक हैं। इसका समाधान केवल नदी तटों की सफाई तक सीमित नहीं हो सकता। सीवेज शोधन संयंत्रों का प्रभावी संचालन, नालों के प्रदूषण पर नियंत्रण, औद्योगिक अपशिष्ट की निगरानी और जल गुणवत्ता की नियमित सार्वजनिक रिपोर्टिंग आवश्यक है।
पूज्य स्वामीजी ने कहा कि नदियों की सेवा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जल को स्वच्छ रखने, कचरा नदी में न डालने और नदी के पुनर्जीवन के लिए निरंतर कार्य करने का संकल्प है।
भारतीय शास्त्र प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का संदेश देते हैं। ईशावास्योपनिषद् का उद्घोष “ईशावास्यमिदं सर्वम्” समस्त सृष्टि में दिव्यता का दर्शन कराता है। अथर्ववेद का पृथ्वी सूक्त धरती को माता और स्वयं को उनकी संतान मानने की संवेदना जगाता है। यह दृष्टि हमें संदेश देती है कि प्रकृति का संरक्षण कोई वैकल्पिक कार्य नहीं, बल्कि हमारा नैतिक और सामाजिक दायित्व है।
पूज्य स्वामीजी ने आह्वान किया कि प्रत्येक नागरिक अपने जीवन में छोटे, किन्तु प्रभावशाली परिवर्तन लाए, पानी और ऊर्जा का विवेकपूर्ण उपयोग करे, एकल-उपयोग प्लास्टिक से बचे, कचरे का पृथक्करण करे, सार्वजनिक परिवहन अपनाए और वृक्षों तथा जलस्रोतों की रक्षा में सक्रिय भागीदारी निभाए।
पूज्य स्वामीजी का संदेश है कि पर्यावरण की रक्षा किसी एक विभाग, संस्था या व्यक्ति का कार्य नहीं; यह हमारी सामूहिक चेतना की परीक्षा है। जब आस्था हमें प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाएगी, विज्ञान हमें समाधान देगा और नागरिक सहभागिता उन समाधानों को व्यवहार में उतारेगी, तभी परिवर्तन स्थायी होगा।


