
रवि शंकर शर्मा
पति-पत्नी का रिश्ता भारतीय समाज में केवल एक सामाजिक अनुबंध नहीं, बल्कि विश्वास, जिम्मेदारी और जीवन-साझेदारी का संबंध माना जाता है। ऐसे में जब यही रिश्ता हत्या जैसे जघन्य अपराध में बदल जाता है, तो उसकी भयावहता और बढ़ जाती है। हाल के चर्चित मामलों में पत्नी और उसके प्रेमी को पति की हत्या के लिए मृत्युदंड सुनाए जाने के बाद एक बार फिर यह सवाल सामने है कि क्या ऐसी कठोर सजाएं भविष्य में इस तरह के अपराधों पर अंकुश लगा सकती हैं?
मेरठ के चर्चित ‘नीले ड्रम कांड’ के बाद अब ‘सांप कांड’ में भी पत्नी और उसके प्रेमी को मृत्युदंड सुनाया गया है। इन मामलों के घटनाक्रम ने समाज को झकझोर कर रख दिया। सबसे चिंताजनक पहलू यह रहा कि पति की हत्या कथित तौर पर केवल आवेश में उठाया गया कदम नहीं थी, बल्कि अपराध को अंजाम देने के बाद उसे छिपाने और जांच को भटकाने के प्रयासों की बात भी सामने आई।
सांप कांड में फैसला सुनाते हुए अदालत ने पत्नी को ‘अर्धांगिनी’ की भारतीय अवधारणा से जोड़ते हुए सावित्री का उदाहरण दिया। अदालत की टिप्पणियों का मूल संदेश यही था कि जिस व्यक्ति के साथ जीवन बिताने की शपथ ली गई हो, उसकी हत्या करना विश्वास और वैवाहिक प्रतिबद्धता, दोनों के साथ विश्वासघात है। मनुस्मृति का उल्लेख करते हुए यह संदेश भी रेखांकित किया गया कि अधर्म अंततः धर्म पर विजय नहीं पा सकता।
इन टिप्पणियों को केवल धार्मिक या पारंपरिक दृष्टिकोण से देखने के बजाय उनके व्यापक सामाजिक संदेश को समझने की जरूरत है। विवाह किसी भी पक्ष को दूसरे के जीवन पर अधिकार नहीं देता। पत्नी हो या पति, किसी को भी अपने जीवनसाथी की हत्या करने का अधिकार नहीं है। कानून के लिए अपराधी का लिंग नहीं, बल्कि उसका कृत्य, उसकी मंशा और अपराध की परिस्थितियां महत्वपूर्ण होनी चाहिए।
यहीं से मृत्युदंड के निवारक प्रभाव का सवाल उठता है। क्या लगातार ऐसे मामलों में कठोरतम सजा सुनाए जाने से उन लोगों के मन में भय पैदा होगा, जो अपने जीवनसाथी को रास्ते से हटाने की साजिश रचते हैं?
संभव है कि कठोर सजा का भय कुछ लोगों को अपराध करने से रोके, लेकिन केवल सजा की कठोरता ही पर्याप्त नहीं है। अपराध रोकने के लिए यह विश्वास अधिक महत्वपूर्ण है कि अपराध करने वाला व्यक्ति पकड़ा जाएगा, जांच निष्पक्ष होगी, मुकदमा प्रभावी ढंग से चलेगा और दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार सजा मिलेगी। यदि किसी व्यक्ति को कानून की पकड़ से बच निकलने की उम्मीद बनी रहती है, तो मृत्युदंड का प्रावधान भी अपना पूरा निवारक प्रभाव नहीं छोड़ पाता।
आज चिंता का एक बड़ा कारण यह भी है कि रिश्तों में बढ़ता अविश्वास, विवाहेतर संबंध, आर्थिक स्वार्थ, संपत्ति विवाद, प्रतिशोध और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गलत व्याख्या कई बार हिंसा का रास्ता खोल देती है। पति-पत्नी के बीच मतभेद होना असामान्य नहीं है, लेकिन मतभेद का समाधान हत्या नहीं हो सकता। यदि रिश्ता निभाना संभव न हो, तो उसे समाप्त करने के लिए कानून रास्ता देता है। किसी की जिंदगी समाप्त करने का अधिकार किसी को नहीं देता।
ऐसे मामलों की प्रकृति और निर्ममता समाज के लिए गंभीर चेतावनी है। इन फैसलों का संदेश केवल पतियों के लिए राहत का नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए चेतावनी का होना चाहिए, जो वैवाहिक या व्यक्तिगत विवाद का समाधान हिंसा अथवा हत्या में तलाशता है। रिश्तों में विश्वास टूटने का अर्थ यह नहीं कि मानवीय संवेदनाएं और कानून के प्रति सम्मान भी समाप्त हो जाएं।
यह भी समझना होगा कि फांसी की सजा किसी अपराध को वापस नहीं कर सकती। वह मारे गए व्यक्ति को जीवन नहीं लौटा सकती और न ही उसके परिवार के दर्द को पूरी तरह मिटा सकती है। न्याय मिलने के बावजूद अपनों को खोने की पीड़ा बनी रहती है। फिर भी, यदि कानून की कठोरता और न्याय व्यवस्था की प्रभावशीलता भविष्य में किसी व्यक्ति को हत्या की साजिश रचने से रोक सके, तो उसका निवारक उद्देश्य अवश्य पूरा होगा।
हालांकि, मृत्युदंड जैसे कठोरतम दंड के प्रभाव का आकलन केवल चर्चित मामलों या सजा की गंभीरता के आधार पर नहीं किया जा सकता। अपराधों की रोकथाम के लिए समय पर न्याय, प्रभावी पुलिस जांच, सामाजिक जागरूकता और रिश्तों में पैदा होने वाले विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।
जरूरत केवल कठोर सजा की नहीं, बल्कि ऐसे सामाजिक वातावरण की है, जिसमें रिश्ते टूटें तो सम्मानपूर्वक टूटें, विवाद हों तो कानून के रास्ते सुलझें और किसी भी पति या पत्नी के मन में यह विचार तक न आए कि जीवनसाथी को रास्ते से हटाना समस्या का समाधान है।
रिश्ता खत्म करने का अधिकार कानून देता है, लेकिन जीवन खत्म करने का अधिकार किसी को नहीं। यही इन फैसलों का सबसे बड़ा सामाजिक संदेश होना चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।)


