माता पूर्णागिरि जहां पंडित ही आस्था पर करते हैं कुठाराघात..

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माता पूर्णागिरि जहां पंडित ही आस्था पर करते हैं कुठाराघात..

बालक बाबा आदित्य दास (ललित)

जनपद चम्पावत स्थित अंतिम रेलवे हैड टनकपुर से लगभग 22 कि०मी० उत्तर पूर्व की ओर अगाध श्रद्धा स्थल, शक्ति पीठ माँ पूर्णागिरि के नाम से विख्यात है। जहाँ उत्तराखण्ड दम्पति टीका (चैत्र कृष्ण द्वितीया) से लगभग तीन माह का मेला तो सरकारी स्तर पर लगता है। इस बीच यहँ पचास लाख से अधिक श्रद्धालु माँ के दर्शन पूजन को पहुंचते हैं। तमाम असुविधाओं के बीच भी जिला पंचायत व जिला प्रशासन/पुलिस प्रशासन के संयुक्त प्रयासों से यहाँ यात्रियों की हर सम्भव सहायता, व्यवस्था का ध्यान रखा जाता है। कहने को तो बाहरी श्रद्धालुओं के विश्राम हेतु धर्मशालाओं की भी व्यवस्था यहां के दुकानदारों द्वारा की जाती है बावजूद मनमानी में कोई कमी नहीं रखते हैं ये लोग! आस्था को सर्वोपरि रखते हुए श्रद्धालुओं का मां के दर्शन ही एकमात्र लक्ष्य होता है।

यूं इस महान तीर्थ में हजार पाँच सौ दर्शनार्थी तो वर्षभर चलते रहते हैं। मेले के बाद की व्यवस्था यहाँ के पण्डित पुजारियों तक सीमित हो जाती है। उक्त मेले के अलावा वर्ष की शारदीय नवरात्रियों व विलायती तिथि दर्शक के नव वर्ष की प्रथम तिथि की पूर्व संध्या व प्रथम तिथि (एक जनवरी) को भी यहाँ 25, 50 हजार दर्शनार्थी पहुंच ही जाते है। लोक मान्यता के अनुसार यहाँ माता, छायासती की नाभि का पतन स्थल है यद्यपि शास्त्र-पुराणों के अनुसार सिद्ध – महात्माओं के अनुसार इसमें तमाम भ्रान्तियों भी है। बावजूद इसके लाखों – लाख श्रद्धालु इस शक्ति पीठ तक पहुंचना अपना सौभाग्य समझते है।

इस बात का अन्दाजा यहाँ सहज ही लगाया जा सकता है कि जहाँ नवजात शिशुओं के सिर मुण्डन का ठेका एक वर्ष का ही 75-80 लाख तक में उठता है तो आम दर्शनार्थियों की संख्या कितनी होती होगी। अपने शक्ति पीठ रहस्य नामक लेख में हिन्दू धर्म सम्राट की उपाधि से विभूषित ब्रह्मलीन स्वामी करपात्री जी महाराज ने “”नाभि'”” के पतन स्थल को कामकोटि पीठ तथा नासिका के पतन स्थल को पूर्णागिरि पीठ लिखा है। लेख के साथ छपे मानचित्र में जहाँ हम आज पूर्णागिरि की महिमा गाते है वह टनकपुर के पास वर्तमान स्थल ही है। महाराज ने माता सती के अंग से उपजे 51 शक्ति पीठों का ही वर्णन किया है। उन्होंने शक्ति पीठ, सिद्धपीठ, देवी पीठ नाम से मॉँ भगवती के स्थानों का अलग-अलग वर्णन किया है।

पं0 श्री आद्यानाथ भक्त का निरंकुश ने अपने एक लेख “शक्तिपीठों” का प्रादुर्भाव में पूर्व शैल या पूरणागिरि में सती के गुह्य स्थान का पतन स्थल तथा वहाँ की शक्ति को पूर्णेश्वरी कहा है। डाॉ० कपिल सिंह ने अपने ‘इक्यावन शक्ति पीठ’ नामक लेख में सती के नाभि पतन स्थल को उत्कल क्षेत्र (उड़ीसा) के सुप्रसिद्ध जगन्नाथ धाम की विमला देवी को बताया है। जबकि काशी के छियासि शक्ति पीठों में अन्नपूर्णा मंदिर को सुप्रसिद्ध ज्योतिर्लिग विश्वनाथ धाम के निकट सेना कहा है राजस्थान के चित्तौडगढ दुर्ग के भीतर भी अन्नूर्णा का मंदिर बताया गया है।

पूर्णागिरी शक्तिपीठ के संदर्भ में महामहोपाध्याय पं0 गोपीनाथ जी कविराज ने माता की
महिमा मंडित व्याख्या में कुछ यूं ‘कहा है कि शक्ति के क्रमिक विकास होते-होते शान्ता शक्ति इच्छा रूप में परणित होती है तथा शिवांश अम्बिका शक्ति भी “वामा” रूप में आविर्भृत होती है इन दोनों शक्तियों के पारस्परिक वैष्य का परिहार होने पर जिस अदृश्य सामरस्यमय बिंदु का आविर्भाव होता है उसके तदनरूप चेतन्य होती है इन दोनों शक्तियों का स्फुरण होता है इस बिंदु को पूर्णगिरि पीठ एवं इस चिद्धिकास को वाण लिंग के नाम से समझना चाहिये। गढ़वाल मण्डल के उत्तरकाशी जिले में असी गंगा के उद्गम स्थल ड्योढ़ी ताल पर भी एक मंदिर अन्नपूर्णा के नाम से विख्यात है। यूं कुमाऊँ मण्डल में विशेषकर काली कुमाऊँ के तमाम स्थानोॉ पर माँ अन्नपूर्णा (पूर्णागिरि) के मंदिर अवस्थित है।

देवी पुराण महाभागवत में छाया सती से उत्पन्न 51 शक्तिपीठों का ही वर्णन है यथा “” पीठानि चैक पंचाशदभवन्मुनिपुंगव अंग-प्रत्यंग पातेन छाया सत्या महीतले” दे. पु. 12-29+30 ।। तंत्र चूणामणि में यह संख्या 51, देवी गीता में 72 जबकि देवी भागवत में 108, जबकि इसमें महापीठों व उपपीठों का अलग-अलग वर्णन नहीं है। यहाँ “”मानसे कुमुदा प्रोक्ता दक्षिणे चोतरे तथा विश्वकामा भगवती विश्वकाम प्रपूरिणी”” अर्थात मानसरोवर में कुमुदा, दक्षिण में विश्वकामा तथा उत्तर मे सम्भवतया (चम्पावत जनपद का टनकपुर क्षेत्र) भगवती को विश्वकामा प्रपूरिणी (पूर्णागिरी/ अन्नपूर्णा) कहते हैं। आशय यह है कि ऋषि – मुनियों या शास्त्रों,पुराणों में चाहे जो भी पृथकता रही हो।

अलग-अलग सम्प्रादायों या मतावलम्बियों ने जो भी विचार प्रकट किये हों परन्तु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि जनपद चम्पावत का पूर्णागिरी शक्तिपीठों जनमानस में उत्तरभारत के महानतम शक्तिपीठों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। परन्तु इतना सब होते हए भी यहाँ ‘ पण्डे पुजारियों के लिये यह धार्मिक-पौराणिक स्थल धन दौलत लूट खसोट का जरिया मात्र है। इनकी दृष्टि में मां की पवित्रता महानता का कोई मोल नही है तभी तो वह श्रद्धालु भक्तजनों के समक्ष भी पैंट पहन कर माता के गभगृह में प्रवेश करने से भी कोई परहेज नही करते इनकी नजर में माता उनकी है वे जैसे चाहें वैसे गर्भगृह में प्रवेश करे जैसे चाहे वैसे पूजा करे बाहरी के लोगों का इससे क्या मतलब” आदि-आदि…………..

बाबा आदित्य दास जी (लेखक)

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दया जोशी (संपादक)

श्री केदार दर्शन

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