तानाशाही: लोकतंत्र का गला घोंटने की कोशिश, सच दिखाने पर पत्रकार दीपक फुलेरा के खिलाफ मुकदमा दर्ज, पत्रकारों में भारी आक्रोश

तानाशाही: लोकतंत्र का गला घोंटने की कोशिश, सच दिखाने पर पत्रकार दीपक फुलेरा के खिलाफ मुकदमा दर्ज, पत्रकारों में भारी आक्रोश

खटीमा/देहरादून। एक ओर जहां ईरान-इजराइल और अमेरिका के बीच युद्ध की परिस्थितियों के कारण देश के विभिन्न हिस्सों में तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित होने की खबरें सुर्खियां बन रही हैं, वहीं उत्तराखंड में धरातल की हकीकत दिखाना एक पत्रकार को भारी पड़ गया। मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र खटीमा में गैस संकट से जूझ रही जनता का पक्ष दिखाने वाले वरिष्ठ पत्रकार दीपक फुलेरा के विरुद्ध पुलिस ने सत्ताधारी दल के नेता के इशारे पर आनन-फानन में मुकदमा दर्ज कर दिया है।
*सच दिखाना बना अपराध: क्या थी ग्राउंड रिपोर्ट?*
बीते बुधवार को चकरपुर क्षेत्र में गैस उपभोक्ताओं की भारी भीड़ और लंबी कतारें लगी थीं। लोग सुबह से ही गैस सिलेंडर के लिए परेशान थे। वरिष्ठ पत्रकार दीपक फुलेरा ने इस जन समस्या को अपने सोशल मीडिया चैनल के माध्यम से प्रमुखता से दिखाया था। लेकिन, जनता की परेशानी को उजागर करना भाजपा मंडल महामंत्री कमलदीप सिंह राणा को रास नहीं आया।
*सत्ता के दबाव में पुलिस की ‘रॉकेट’ रफ्तार!*
हैरानी की बात यह है कि जहां आम जनता छोटे-छोटे मामलों में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराने के लिए थानों के चक्कर काटकर थक जाती है, वहीं इस मामले में पुलिस ने बिना किसी प्रारंभिक जांच-पड़ताल के भाजपा नेता की तहरीर पर तुरंत धारा 353(1)(B) BNS के तहत मुकदमा पंजीकृत कर लिया। भाजपा नेता का आरोप है कि गैस की कमी की खबर दिखाने से ‘सरकार की छवि धूमिल’ हुई है।
*”क्या अब जनता की समस्या दिखाना भी सरकार की छवि खराब करना माना जाएगा यदि पत्रकार धरातल की हकीकत नहीं दिखाएगा, तो लोकतंत्र कैसे बचेगा?”*
👆 — स्थानीय पत्रकारों का सामूहिक प्रश्न।
*नेशनलिस्ट यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (NUJ) की कड़ी चेतावनी*
पत्रकार उत्पीड़न की इस घटना के बाद नेशनलिस्ट यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (NUJ उत्तराखंड) ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। संगठन ने इसे ‘मीडिया की आवाज दबाने का कुत्सित षड्यंत्र’ करार दिया है।
*यूनियन के पदाधिकारियों का कहना है कि:*
भाजपा नेताओं के इशारे पर पुलिस पत्रकारों को निशाना बना रही है।
जनहित और जन सरोकारों की खबरों को दबाने के लिए मुकदमों का सहारा लिया जा रहा है।
संगठन इस उत्पीड़न को कतई बर्दाश्त नहीं करेगा और पूरे राज्य में इसके खिलाफ जोरदार आंदोलन छेड़ा जाएगा।
*एक विचारणीय प्रश्न*
अगर सच्चाई दिखाने पर पत्रकारों के खिलाफ इसी तरह फर्जी और भ्रामक आधारों पर मुकदमे दर्ज होते रहे, तो भविष्य में कोई भी पत्रकार जनता की आवाज उठाने की हिम्मत नहीं कर पाएगा। खटीमा की यह घटना उत्तराखंड में ‘प्रेस की स्वतंत्रता’ पर एक बड़ा काला धब्बा है।



