

“तू पार्लर चलाता है, पांच हजार दे… तू ठेकेदार है, दस हजार दे” — जियोलिकोट चौकी में मारपीट के बाद रकम मांगने का आरोप, यूपीआई से नैनी फिलिंग स्टेशन और कर्मचारी के खातों में पहुंची रकम

नैनीताल/ज्योलिकोट। देश-दुनिया से पर्यटक जिस नैनीताल की खूबसूरती और सुकून के लिए पहुंचते हैं, उसी पर्यटन नगरी में पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। 14 अगस्त को नीम करौली से लौट रहे चार पर्यटकों ने जियोलिकोट पुलिस चौकी के तीन कांस्टेबलों पर पहले वाहन रोककर चौकी लाने, मारपीट करने, चालान काटने और इसके बाद उनकी आर्थिक स्थिति के हिसाब से रकम मांगने के गंभीर आरोप लगाए हैं। इस मामले में पीड़ितों के पास कथित भुगतानों की यूपीआई डिटेल और स्क्रीनशॉट भी मौजूद बताए जा रहे हैं।
जानकारी के मुताबिक सुनील कुमार, मनीष सिंह, श्रियांश साहू और सुशील राजपूत स्कॉर्पियो से नीम करौली की ओर से लौट रहे थे। जियोलिकोट चौकी के पास बच्चों की तिरंगा यात्रा निकल रही थी। पीड़ितों के अनुसार, स्कॉर्पियो में सवार दो युवकों ने यात्रा में शामिल बच्चों को तिरंगे दिए। इसके बाद 112 पर शिकायत की गई कि वाहन सवार युवकों ने स्कूल की बच्चियों के साथ छेड़छाड़ की है।
आरोप है कि इस शिकायत के बाद आगे जाकर स्कॉर्पियो को रोक लिया गया और चारों युवकों को वापस जियोलिकोट पुलिस चौकी लाया गया। पीड़ितों का आरोप है कि चौकी में उनके साथ मारपीट की गई और इसके बाद ढाई-ढाई सौ रुपये के चालान भी किए गए।
लेकिन आरोपों के मुताबिक, मामला चालान तक सीमित नहीं रहा। पीड़ितों का कहना है कि इसके बाद उनसे उनके कामकाज और कमाई के बारे में पूछा गया और उसी आधार पर रकम की मांग की गई। एक युवक ने बताया कि वह पार्लर चलाता है तो उससे कथित तौर पर कहा गया—“तू पार्लर चलाता है, पांच हजार रुपये दे।” वहीं स्कॉर्पियो मालिक के ठेकेदार होने की बात सामने आने पर उससे कथित तौर पर दस हजार रुपये देने को कहा गया। अन्य युवकों से भी अलग-अलग रकम मांगे जाने का आरोप है।
18 हजार रुपये का यूपीआई लेनदेन, पेट्रोल पंप के खातों तक पहुंची रकम
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे गंभीर सवाल कथित भुगतान को लेकर है। पीड़ित पक्ष के अनुसार, उनसे कुल करीब 18 हजार रुपये का लेनदेन यूपीआई के माध्यम से कराया गया। उपलब्ध भुगतान विवरण के मुताबिक, रकम का कुछ हिस्सा नैनी फिलिंग स्टेशन के खाते में और कुछ भुगतान इसी पेट्रोल पंप पर कार्यरत कर्मचारी के बैंक खाते में गया।
यानी आरोप केवल मौखिक नहीं हैं, बल्कि पीड़ित पक्ष द्वारा भुगतान के स्क्रीनशॉट और लेनदेन की जानकारी सामने रखी गई है। अब सवाल यह है कि पुलिस चौकी से जुड़े इस पूरे घटनाक्रम में पेट्रोल पंप के खाते और उसके कर्मचारी के खाते का इस्तेमाल क्यों हुआ? रकम सीधे संबंधित पुलिसकर्मियों के बजाय इन खातों में क्यों भेजी गई?
तीन कांस्टेबलों पर सीधे आरोप
पीड़ितों ने जॉलीकोट चौकी में तैनात चंदन आर्या, नीरज कुमार और धर्मेंद्र कुमार पर मारपीट करने तथा उनसे रकम मांगने और लेने के आरोप लगाए हैं। पीड़ित पक्ष द्वारा बताए गए घटनाक्रम और उपलब्ध भुगतान विवरण ने मामले को और गंभीर बना दिया है।
यह अब महज किसी कथित मौखिक शिकायत का मामला नहीं रह जाता, क्योंकि भुगतान से जुड़े रिकॉर्ड सामने होने का दावा किया गया है। ऐसे में संबंधित पुलिसकर्मियों की भूमिका के साथ-साथ उन खातों की भी जांच जरूरी है, जिनमें रकम ट्रांसफर हुई।
पेट्रोल पंप कर्मचारी की भूमिका भी जांच के घेरे में
बाद में बातचीत और कथित दबाव के बीच पीड़ितों से ली गई रकम वापस किए जाने की बात सामने आई। लेकिन रकम लौटाए जाने से कई गंभीर सवाल खत्म नहीं हो जाते। जिस पेट्रोल पंप कर्मचारी के खाते में रकम गई, उसकी भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।
यह पता लगाया जाना जरूरी है कि अब तक उस कर्मचारी के बैंक खाते में पुलिसकर्मियों अथवा पुलिस से जुड़े लोगों की ओर से कितने यूपीआई भुगतान हुए हैं। किन तारीखों में कितनी रकम आई, किसने भेजी और किस उद्देश्य से भेजी गई—इन सभी बिंदुओं की बैंकिंग रिकॉर्ड के आधार पर जांच होनी चाहिए।
इसी तरह नैनी फिलिंग स्टेशन के खाते में अब तक पुलिसकर्मियों या पुलिस से जुड़े लोगों की ओर से कितने भुगतान हुए हैं, इसकी भी पड़ताल जरूरी है। यदि इस खाते में पहले भी इसी तरह के भुगतान हुए हैं तो उनकी पूरी जानकारी सामने आनी चाहिए। यह जांच इस पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकती है।
सवाल सिर्फ 18 हजार का नहीं, वर्दी की विश्वसनीयता का है
अगर पीड़ितों के आरोप और उपलब्ध भुगतान रिकॉर्ड जांच में सही पाए जाते हैं तो यह मामला सिर्फ 18 हजार रुपये की कथित वसूली का नहीं रहेगा। सवाल यह होगा कि क्या पुलिस चौकी में कार्रवाई के नाम पर किसी व्यक्ति की आर्थिक हैसियत देखकर रकम तय की गई? क्या पुलिस से जुड़े किसी मामले में पेट्रोल पंप और उसके कर्मचारी के खातों का इस्तेमाल भुगतान लेने के लिए किया गया?
नैनीताल अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल है। यहां आने वाला हर पर्यटक उत्तराखंड की पुलिस और प्रशासन के व्यवहार को प्रदेश की छवि से जोड़कर देखता है। ऐसे में जॉलीकोट चौकी से सामने आया यह मामला नैनीताल पुलिस की कार्यशैली, जवाबदेही और वर्दी की विश्वसनीयता पर गंभीर सवालिया निशान खड़ा करता है।
अब इस मामले में सिर्फ रकम वापस किए जाने से बात खत्म नहीं होनी चाहिए। 18 हजार रुपये के पूरे यूपीआई लेनदेन, नैनी फिलिंग स्टेशन के खाते, संबंधित कर्मचारी के बैंक खाते और जॉलीकोट चौकी में तैनात आरोपित कांस्टेबलों की भूमिका की निष्पक्ष जांच जरूरी है। जांच से यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि यह लेनदेन केवल इसी घटना तक सीमित था या इससे पहले भी ऐसे भुगतान होते रहे हैं।
क्योंकि सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि 18 हजार रुपये वापस हुए या नहीं—सवाल यह है कि वे गए कहां, किसके कहने पर गए और क्यों गए? यही सवाल नैनीताल पुलिस की कार्यशैली पर सबसे बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर रहा है।


